हम अपनी शरण में जाकर स्वंय को पहचान सकते हैं,व्यक्तित्व में बदलाव भी ला सकते हैं।प्रायःजो बीज जिस गुण धर्म का होता है,जमीन में बोये जाने पर अपने गुण धर्म को ही प्रस्फूटित करता है,बबूल का बीज बोकर आम प्राप्त नही किया जा सकता है।लेकिन वही बबूल बीज अपने आप को पहचान ले तो अपनी स्वभाव को बदल सकता है उस बीज से आम प्राप्त नही होगा और उसकी तितिक्षा मिट जायेगी।लेकिन बबूल बीज सदा ही दूसरे पर आश्रित रहता है इसलिये वह प्रयास भी नही कर सकताहै।जबकि मनुष्य विचारवान है,अपने में विद्यमान राग का त्याग कर सकता है फलतः अपने आप में आमूल परिवरतन कर सकता है।जब तक हम दूसरे पर आश्रित रहेंगे हमारा संस्कार,जाति संस्कार, रूप रस संस्कार बंधे रहेंगे।लेकिन जब हम अपनी शरण में जायेंगे तो अपने संस्कार जाति रूपरंग को त्याग सकते हैं।यही त्याग ही हमें रागरहित कर सकता हैऔर तभी हम परिवर्तित हो सकते हैं,हम अपनी प्राण को पहचानने वाला संतमहापुरूष की श्रेणी में आ सकते हैं,अपनी लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं हमारा स्वभाव साधु की हो सकती है,क्योंकि साधु व्यक्ति नही होता जो चित ईर्ष्या द्वेष कलह से वंचित होता है वही साधु होता है वही पिन्ड दर्शन कर सकता है अपने में ब्रह्मांड का दर्शन कर सकता है ईश्वरीय गुणों को आत्मसात कर सकता है।
Sunday, April 4, 2010
Saturday, February 27, 2010
स्वयं में शरणागत होकर ही पिन्ड द्ररशण संभव है।
हम प्रायःअपनी विचारों को दूसरों पर क्रियान्वयन होते देख़ना चाह्ते हैं इससे सन्तुष्टि मिलती है। दूसरो पर प्रभाव नही होने पर क्षोभ उत्पन्न होता हैऔर हम उत्तेजित हो जाते हैं। यही उत्तेजना ही क्रोध वैमनस्य उत्पन्न होने का कारण बनता है। जिससे हम या तो अपने आप में सिमट कर कुंठित होते हैं या बद्ले की भावना से प्रतिकार की लालच में अपना ब्यक्तित्व खो देते हैं।तनावग्रस्त जीवन जीते हैं,हमारा अंतः और बाह्य आचरण में अंतर आता है फलत:हमारे द्वारा पद्दी गयी सुनी गयी बौद्धिक विकास की बातें विलीन हो जाती हैं हम आवेश में प्रतिज्ञा करते भी हैं तो तक्षण क्रियान्वयन नही होता है,अपने में अविश्वास उत्पन्न होता है।यह तनाव,अविश्वास अपने में शरणागत होकर ही दूर हो सकता है। अपने शरण में जाकर ही हम स्वंय को पहचान कर अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। अन्यथा एक छ्दम दोहरा ब्यक्तित्व धारण कर पूरी जिन्दगी जीना होता है,दूसरे पर आश्रित रहने की प्रव्रति रहती है,बार बार हमें हमारे बनाये ब्यक्तित्व को बचाने का प्रयास करते रहना पड्ताहै और हम दिशाहीन जिन्दगी जीकर अपने लक्ष्य से दूर भटकते हैं। लक्ष्य अप्राप्ति पर हम दूसरों को दोष देते हैं।अपनी शरण में जाना निजी कर्तब्य के प्रति जाग्रत होना,अधिकार को भलीभातिं पहचाना,कायरता और दूसरों कीअश्रितता त्यागना है तभी हम अपने आप में रम सकते हैं,त्रिप्त रह सकते हैं, हमारा अंत;और बाह्य ब्यक्तित्व में समानता आ सकती है।जिससे हम स्वयं का पिन्ड द्श्रण कर ब्रह्मान्ड का र्द्शण कर सकते है।क्रमश:
Monday, January 25, 2010
पिन्ड में ही ब्रह्मांड है।
Sunday, January 3, 2010
भक्ति
मनुष्य जब तक असंयमित रहता हैअस्त ब्यस्त रहता है, तनाव में रहता है,अपने श्वांस पर नियत्रण नही रख पाता है फलतःआवेग भी अनियंत्रित होता है। यही आवेग ही उसे अकारण ऊत्तेजित कराता है,विवेकहीन बनाता है,अंहकारी बनाता है और जिस प्रकार छुईमुई पौधा बालकों के लिये खेल कौतुहल बन जाता हे उसी प्रकार आवेशित मनुष्य भी दूसरों के लिये खिलौना बन जाता है। यह जीवनी शक्ति को कम करता है।असंयमित ब्यक्ति में गंभीरता नही होती है,जबकि गंभीरता ही संतुलन धैय प्रदान करता है.संघषशील होने मे सहायक होता है।जूझारू ब्यक्ति ही लछ्य तक पहुंच सकता है।जीवन में अधिक ऊचांई को छूने के लिये संतुलन की अधिक आवश्यकता होती है।यही संतुलन ही काम क्रोध,लोभ मोह को बांधकर ऊन्नतशील बनाता है।संतुलित ब्यक्ति जुझारू ,आत्मबली होता है,आलसी नही हो सकता है। क्योंकि आलसी सदा ही दूसरों की सहायता के लिये आकाक्छित रहता है ,और चाहिये की रट लगाये रहता है.अपने जीवन और ईश्वर, भाग्य को कोसता रहता है ,क्रोधी होता है।संतुलन के अभाव में ,क्रोध ऊत्पन होता है जिससे वह अन्दर से डरा घबराया रहता है।
इन कमजोरियों को आत्मचिन्तन करके ही दूर किया जा सकता है।आत्मचिन्तन ही हमारा पथप्रदशक बनकर हमारी अधिभौतिक, अधिदैविक,आध्यात्मिक मूल्य को बढ़ा सकता है, हममे जीवनी शक्ति संचार कर आत्मबली बना सकता है, जिस प्रकार बढ़ई काष्ठ को रूप देकर बाजार मे उसका मूल्य प्रदान करता है़।यदि हम आत्मचिन्तन नही कर सकते तो सदगुरू की सतसंग करें,वे हमें आत्मचिन्तन की ओर ले जायेंगे।जो हमें स्थिरता,संतुलन प्रदान करेंगे।क्योंकि गुरू गु.. अन्धकारऔर रु..प्रकाश,हमें अन्धकार से प्रकाश कीओर ले जाते हैं।अन्यथा मातापिता के सालोंसाल तक प्रदत अच्छी संस्कार भी उसे राम तो नही बना सकेगा,कुत्सगीं का छणिक प्रभाव उसे रावण अवश्य बना देगा।सदगुरू ही हमें आत्मसाछ्ताकार कराता है,जो ब्रह्मान्ड मे है बाहर ब्याप्त है वह हमारे अन्दर ही विद्यमान है का बोध कराता है।
Saturday, November 28, 2009
भक्ति
Sunday, October 25, 2009
पिन्ड मे ही ब्रह्मान्ड है।
नियामक व सृष्टा परम शिव ही दृष्टि की ईच्छा होने सगुण है।इससे दो तत्व शिव व शक्ति उत्पन्न होते हैं।शक्ति पूणॆ रुपेण स्फुरित अवस्था को प्राप्त करने में ४ स्थितियाँ निशा,परा,अपरा,सूछ्म,से गुजर कर कुन्डलिनी शक्ति के रुप मे विकसित होती है जो शिव के पांच अवस्थाओं का प्रतीक है।कुन्डलिनी शक्ति स्थूलता की ओर बढने से तीन स्फूरित तत्व सदाशिव अहं ईश्वर इदं व शूद्ध विधा अहं+इदं निमित होता है।अहं की पांच अवस्थओं परमानन्द,प्रबोधचित,उदय प्रकाश,व सोहं की आनन्दो से शरीर बनता है।शिव ही शक्ति के सयोंग से इस जगत का रूप बदलता है,उसी प्रकार प्रत्येक पिन्ड उसी प्रक्रिया से गुजरता हुआ अपने स्वरुप में आता है जिससे ब्रह्मान्ड बना हैऔर सत्व रज तम,काल व जीव की अधिकता व न्यूनता के कारण भेद प्रकट होता है।यही सिद्धांत जो पिन्ड मे है वही ब्रह्मान्ड मे है प्रतिपादित होता है।
Friday, October 2, 2009
जो पिन्ड मे है वही ब्रह्मांड मे है।योगमत,शैवमत,प्राचीन वैदिक विराट कल्पना वौद्धिक वैष्णव मत का ऐकीकरण का प्रतीक है। ईसके अनुसार परम तत्व का वास्तिवक रुप शून्य पुरूष व ब्रह्म,शिव व शक्ति है जिसका आवास मनंग गोचर है।उसी ने जगत को बनाया है, विराट पुरूष के रुप मेशून्य पुरूष का ज्योति स्वरुप है, वही आदि ब्रह्म भी है जो बिन्दु ब्रह्म के रुप मे भौतिक रुप धारण कारता है। बिन्दु ब्रह्म से निवृत दो रुप रा ऐवं म मे दो अछर मे निहित होता है जो क्रमशः राधा व कृष्ण,पुरुष व प्रकृति मे परिणित होकर नित्य लीला मे लीन रहता है।